दिल्ली उपद्रव के दोनों पहलुओं पर मंथन करना होगा न्यायसंगत:- सुशील पंडित

समाचार क्यारी:-

आंदोलन अर्थ है शासन व्यवस्था और नीतिकारों के विरुद्ध मुखर होकर अपने अधिकारों के सरंक्षण लिए आवाज उठाना और इन परिस्थितियों के उत्पन्न होने का कारण होता है आंदोलन से सम्बंधित व्यक्ति विशेष या कोई विशेष वर्ग अपने अधिकारों के प्रति चिंतित या असंतुष्ट हो औऱ सामान्य तौर पर समस्या का सकारात्मक परिणाम न मिले।

किसी भी आंदोलन या क्रांति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है नैतिक बल की, नैतिकता के आभाव में चलाया गया आंदोलन परिणामरहित व दिशाहीन हो सकता है।

आज लेख में कृषि कानूनों केे लाभ या हानि की बात नही हो रही अपितु किसानों के उस आंदोलन की ओर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास हो रहा है जिसमें देश के सैकड़ों किसानों ने अपने प्राणों की आहुति दी तथा चिंतन उस भारत के लोकतंत्र की मर्यादा पर हो रहा है

जिसकी अस्मियता और अस्तित्व को जीवित रखने के लिए अनगिनत शहीदों ने मातृभूमि पर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए,आज विचार उस तिरंगे पर करना होगा जिसके लहराने भर से प्रत्येक हिंदुस्तानी स्वंम को जीवित और गौरवान्वित महसूस करता है।

किसानों के द्वारा किया जा रहा संघर्ष 26 जनवरी 2021से पूर्व योजनाबद्ध तरीके से चल रहा था परंतु ऐसा क्या हुआ कि देश का अन्नदाता एकाएक उपद्रवी घोषित हो गया क्या यह आंदोलन में बिखराव पैदा करने की साज़िश थी या फ़िर राजनैतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित अखण्ड भारत के लोकतंत्र पर अप्रत्यक्ष रूप से किया गया आघात?भारत की स्वतंत्रता के पश्चात अनेकों प्रकार के आंदोलन देश में हुए और होते रहेंगे क्योंकि मौजूदा शासन प्रणाली की नीतियों और कार्यप्रणाली से देश का कोई भी वर्ग स्वंम को उपेक्षित या प्रताड़ित महसूस करता है तो निश्चित रूप से वह वर्ग अपना पक्ष आंदोलन के माध्यम से रखने का प्रयास करता है।

के द्वारा किया जा रहा कृषि कानूनों का विरोध सीधे तौर पर मौजूदा सरकार से है औऱ इस प्रकार के आंदोलनों में विपक्षी दलों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप स्वभाविक माना जा सकता है परंतु 26 जनवरी को दिल्ली में हुए उपद्रव से अराजक और असमाजिक तत्वों का आंदोलन में संलिप्त होना देश औऱ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अस्वभाविक रहा।

लाल किले में घटित हुआ असवैधानिक और अमानवीय कृत्य सम्पूर्ण देश के लिए चिंता का विषय है,2 महीनों से शांतिपूर्ण तरीके चला आ रहा किसान आंदोलन अचानक रुद्र और उग्र रूप धारण करेगा यह किसी भी भारतीय ने कदापि नहीं सोचा होगा परन्तु यहाँ विचार करने वाली बात यह भी है कि जो किसान कड़ाके की ठंड में 2 महीने से आंदोलन को मर्यादित औऱ अनुशासित रूप से चला रहे थे क्या वही किसान पथभ्रष्ट होकर इस प्रकार के उपद्रव को अंजाम देकर अपनी महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकते है? क्या आंदोलन से सरकार के प्रति बनी अपेक्षाओं और संभावनाओ को यह किसान एक पल में समाप्त कर सकते है?

क्या वास्तविकता को आधार बनाकर संघर्ष कर रहा किसान एक उद्दंड बालक जैसा व्यवहार करेगा? यही कुछ ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर स्वंम सरकार के पास भी हो सकता है बशर्ते इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो। ज्ञात रहे लाल क़िले में हुई शर्मनाक घटना में पंजाब के किसी गायक दीप सिधू का नाम भी सुर्खियों में चल रहा है जबकि किसान नेताओं का कहना है कि किसान आंदोलन से दीप सिधू का कोई लेना देना नही था परंतु सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों में यह शख्स इस घटना से पूर्व ही लाल किले के भीतर दिखाई दे रहा है इसके अलावा भी किसान ट्रैक्टर मार्च के दौरान हुुुए उपद्रव से जुड़ी कई संभावनाएं हैं जिन्हें सिरे से नकारना गलत होगा।

सरकार के अनुसार कहा जा रहा है कि किसानों के द्वारा 26 जनवरी के ट्रैक्टर प्रेड का आह्वान सरकार ने स्वीकार किया और निर्धारित रूट भी किसान नेताओं को दिया गया जिसकी अनुपालना का आश्वासन किसानों की ओर से सरकार को दिया गया परंतु सरकार के उच्च अधिकारियों के कथन के अनुसार कहा जा रहा है कि किसानों ने निर्धारित समय से पूर्व ही ट्रैक्टर रैली आरम्भ कर दी औऱ निर्धारित रैली मार्ग पर न चलकर अन्य मार्गों से दिल्ली में प्रवेश किया गया।

इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि देश के अन्नदाता अर्थात किसान को भावनात्मक दृष्टि से देखा जाता है परंतु जब बात देश की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान की होती है तो समझौता नहीं किया जा सकता, बात लाल किले में घुसकर तोड़फोड़ कर किसी विशेष धर्म और सगठन का झंडा फहराने की थी।इन परिस्थितियों में किसी वर्ग या सगठन के प्रति भावुकता दिखाने की नही थी अपितु देश की अस्मियता का संरक्षण करना मौजूदा शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए थी।

जानकारी के अनुसार दिल्ली पुलिस कमशीनर ने 26 जनवरी को होने वाली ट्रैक्टर मार्च की संवेदनशीलता को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल के जवानों की तैनाती की भी मांग की थी फिर ऐसा क्यों हुआ कि इस ओर सरकार के द्वारा गंभीरता नहीं दिखाई गई जिसका परिणाम दिल्ली पुलिस के सैकड़ों जवान घायल हुए और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत परिहास का विषय बनकर रह गया।

यद्यपि मौजूदा सरकार ने स्वस्थ लोकतंत्र का उदाहरण देते हुए किसानों को ट्रैक्टर मार्च निकालने की अनुमति दी थी परंतु किसान पक्ष के द्वारा भी बयान दिए जा रहे है जो दुर्भाग्यवश देश के प्रसिद्ध मीडिया औऱ टीवी चैनलों ने नही दिखाया कि सरकार ने उन्हें जो रूट मैप दिया गया था वहां पहले ही अवरोधक लगाए गए थे तथा उन्हें अन्य मार्गों से प्रवेश करवाया जा रहा था किसान नेताओं के अनुसार जिन लोगों ने लाल किले में उपद्रव किया है उनका किसान आंदोलन से कोई सरोकार नहीं था।

वस्तुतः स्थिति जो भी रही होगी परन्तु यह सरकार, देश और किसानों के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण सत्य जैसा रहा है सरकार की व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह, देश की अस्मियता पर आघात औऱ किसान के आंदोलन में बिखराव की स्थिति यही हुआ है 26 जनवरी के प्रकरण के पश्चात।

वर्तमान परिस्थितियों से यह तो स्प्ष्ट हो चुका है कि किसान आंदोलन को निर्बल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश प्रतिष्ठा की धज्जियाँ उड़ाना इस घटना से जुड़े लोगों औऱ संगठनों का एकमात्र उद्देश्य हो सकता है औऱ वर्ग या दल विशेष की स्वार्थ सिद्धि के उद्देश्य से किया गया यह कुकृत्य वास्तव में इतिहास के काले पन्नों में दर्ज होगा इसलिए मौजूदा हालात को देखते हुए दिल्ली उपद्रव के दोनों पहलुओं पर मंथन व चिंतन करने की अति आवश्यकता होगी।

बहरहाल जहां 26 जनवरी के बाद आंदोलन में आए अलगाव के अगले दिन से ही किसानों का संघर्ष पुनः व्यवस्थित होता दिखाई दे रहा है वहीं हरियाणा,पंजाब और उत्तरप्रदेश के किसान भारी संख्या में दिल्ली की सीमा पर एकत्रित होने लगे हैं तीनों कृषि कानूनों की रद्द करने का स्वर पुनः मुखर होने लगा है।

किसानों और सरकार की 11 बार हो चुकी विफल वार्ता के पश्चात देश के प्रधानमंत्री ने शनिवार को फिर से बातचीत के माध्यम से आंदोलन समाप्त करने का आह्वान किया है जो किसान आंदोलन के जीवित अस्तित्व का प्रमाण भी माना जा सकता है।

इन परिस्थितियों में सरकार और देश के किसान की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों का अनुसरण करते हुए किसानों की वास्तविक स्थिति पर गहनता से विचार करे तथा किसान इस आंदोलन में नैतिकबल को आधार बनाकर विवेकपूर्ण ढंग से राष्ट्रहितैषी विचारधारा का परिचय प्रस्तुत करें।

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