सोशल मीडिया पर चल रही आधारहीन पत्रकारिता से पत्रकार की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह:- सुशील पंडित

आज हमारा समाज असमंजस की परिस्थितियों से गुजर रहा है वर्तमान परिवेश में आधुनिकता की गति में इतनी तीव्रता है कि सही गलत का या तो आभास नही है या हम इस पर विचार करना उचित नहीं समझते। इस लेख का आशय सम्पूर्ण समाज को मीडिया और सोशल मीडिया के अंतर से अवगत कराने है। वर्तमान परिदृश्य में सोशल मीडिया का आश्रय लेकर फर्जी पत्रकारिता को भी बढ़ावा मिला है।
सोशल मीडिया का उपयोग सामजिक समन्वय स्थापित करने के लिए होना चाहिए था परंतु वर्तमान में कुछ लोग सोशल मीडिया को गलत तरीके से सस्ती लोकप्रियता का मंच बना कर पत्रकारिता, समाज व राष्ट्र की मर्यादाओं के साथ खिलवाड़ करने में लगे हैं। पत्रकार व पत्रकारिता के देश के हर वर्ग के प्रति कुछ दायित्व व जिम्मेदारी होती है जिनका निर्वहन एक पत्रकार भली भांति करना जानता है परंतु कुछ अनुभवहीन  लोगों ने व्यक्तिगत प्रलोभन चलते मीडिया को समाज के दृष्टिकोण में बाजारवाद की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। आज परम्परागत मीडिया पर सोशल मीडिया हावी हो गया है। यहाँ परम्परागत मीडिया से अभिप्राय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मान्यता प्राप्त समाचार पत्र,पत्रिकाओं व सामान्य रूप से समाचारों का प्रसारण कर रहे न्यूज़ चैनलों से है।
खबरों की विश्वसनीयता से सरोकार रखने वाली जनता आज सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म से प्रसारित होने वाले समाचार की शक्ल के पोस्ट से दुविधा में है क्या झूठ क्या सच यह सुनिश्चित करना अब सरल नही रहा। सोशल मीडिया से फेसबुक, यूट्यूब, व अन्य साधनों से एक  सामान्य जानकारी को समाचार का स्वरूप देकर अपने व आधारहीन जानकारी देने वाले लोगों के निजी स्वार्थ के चलते वास्तविक स्वरूप में मौजूद पत्रकारिता के लिए बहुत बड़ी चुनौती है और यह चुनौती प्रतिस्पर्धा के रूप में मीडिया के समक्ष नहीं है अपितु पत्रकारिता की अस्मियता बचाने के लिए है क्योंकि सच्ची व ईमानदार पत्रकारिता की छवि पर ग्रहण की स्थिति दिखाई दे रही है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के
आंकड़ों की यदि बात करें तो वर्तमान में
इंटरनेट के माध्यम से चल रहे पोर्टल व यूट्यूब पर स्वम्भू न्यूज़ चैनल में से लगभग 70 प्रतिशत के पास किसी प्रकार कोई मान्यता नहीं है जिन्हें भारत सरकार के द्वारा अवैध माना जा रहा है। जो भी
समाचार पत्र,पत्रिका या पोर्टल भारत सरकार के आरएनआई द्वारा पंजीकृत होगा और जिस भी टीवी,रेडियो तथा यूट्यूब चैनल का सूचना प्रसारण मंत्रालय से पंजीकरण होगा उसी के द्वारा पत्रकार या संवाददाता की नियुक्ति की जा सकती है परन्तु मंत्रालय के द्वारा जारी स्प्ष्ट दिशा निर्देश के बाद भी नियमों की आए दिन धज्जियां उड़ाई जा रही है और यह सब  सरकारी तन्त्र और सरकार के प्रतिनिधियों के समक्ष हो रहा है यहाँ ये तो स्पष्ट है कि बिना किसी अनुमति या पंजीकरण के यह सारा खेल समाज के उन तत्वों पर आधारित है जो अपने निजी महत्वकांशा और सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में निरंतर अग्रसर और हावी होने में लगे हुए हैं।
सोशल मीडिया के माध्यम से चल रही फर्जी पत्रकारिता और मीडिया की छवि खराब करने की आए दिन घटित हो रही घटनाओं को देखते हुए अब मौजूदा शासन व कुछ स्थानों पर प्रशासन ने भी नकेल कसने की तैयारी शुरू कर दी है
माननीय उच्चत्तम न्यायालय के द्वारा प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व सोशल मीडिया के सम्बद्ध में रिट याचिका सिविल 468/2020 व 469/2020 में पारित  आदेशों के तहत भ्रामक प्रचार करने वाले लोगों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 188,505-1तथा कोविड19 की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 54 तथा एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1957 की धारा 1 व 2 के तहत दण्ड का प्रावधान भी सुनिश्चित किया गया है।
हरियाणा के कुछ जिलों में तो इस प्रकार के प्रसारण पर रोक लगा दी गई है जिन लोगों के द्वारा बिना किसी पंजीकरण के पत्रकारिता के रूप सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म जैसे यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, ट्विटर, टेलीग्राफ, पब्लिक एप का संचालन न्यूज चैनल के रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप किया जा रहा था उन्हें तुरंत प्रभाव से बन्द करने के आदेश भी जारी किए हैं। वहीं इन कार्यों में सक्रिय लोग इन आदेशों को हो सकता है कि  कोरोना काल में लिए गए अस्थायी निर्णय ही समझ रहे हैं परन्तु पत्रकारिता के वास्तविक स्वरूप को जीवित रखने के लिए ये सब होना स्वभाविक भी हो सकता है। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया के माध्यम से पत्रकारिता करना अपराध है परन्तु सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के दिशा निर्देश की अवहेलना करना किसी अपराध से कम भी नही है सोशल मीडिया पर समाचार प्रस्तुत करने के लिए सरकार के द्वारा जो भी दिशा निर्देश जारी किए गए हैं सर्वप्रथम उनकी पालना करना भी सोशल मीडिया के साधनों का उपयोग करने वालों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है समाचार को वास्तविक समाचार के साधनों से पूर्व प्रस्तुत करने की दौड़ में खबर की पुष्टि न करना ये पत्रकारिता का हिस्सा कदापि  नही हो सकता यदि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी सामाजिक व लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और जिम्मेदारी से विमुख होगा तो राष्ट्र निमार्ण में मीडिया की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वभाविक हो सकता है। सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के हो रहे उपहास को ध्यान में रखते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय प्रस्तावित विधेयक के अनुसार सरकार इपेपर्स और डिजिटल न्यूज़ को मान्यता देने की भी बात कही है पीआरबी अधिनियम प्रेस और रजिस्ट्रेशन ऑफ बुक्स 1867 के स्थान पर अब प्रेस एवं पत्रिका पंजीकरण विधेयक प्रस्तावित भी कर दिया है जिसके अंतर्गत डिजिटल न्यूज़ व वेबसाइट्स न्यूज़ का मंत्रालय से पंजीकरण करवाना अनिवार्य हो गया है।
बहरहाल जो सोशल मीडिया पर अवैध रूप से समाज,सरकार व प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है वह किसी भी वर्ग के लिए उचित तो नहीं हो सकता
कोरोना काल के दौरान ही सरकार ने इस दिशा में कड़े कदम उठाने का प्रयास किया है क्योंकि बात अब शासन व्यवस्था से छेड़छाड़ की थी परन्तु देर आए दुरुस्त आने वाली बात भी सरकार व प्रशासन की इस पहल पर सटीक बैठती है।
बिना सँघर्ष किए पत्रकार बनना या अन्य किसी को बनाना तथा खबरों को सुनियोजित ढंग से प्रस्तुत करना सोशल मीडिया का सीधे तौर पर दुरुपयोग ही कहा जा सकता है जिस उद्देश्य के लिए सोशल मीडिया के रूप यह सरल साधन हमें उपलब्ध हुआ था उसके सकारात्मक परिणाम वर्तमान में हमारे समक्ष बहुत
अधिक नजर नही आते। परंतु जिस प्रकार सरकार व सम्बंधित विभाग के द्वारा इस समस्या को गभीरता से लेने का विचार है उस दृष्टि से यह स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि वर्तमान परिवेश में पत्रकारिता की स्वच्छ,स्वस्थ व सुदृढ़ छवि को धूमिल करने वाले कुछ गैरजिम्मेदार लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने की अति आवश्यकता है।

फ़ोो

 

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