मानवीय मूल्यों को आधार बनाकर ही सोशल मीडिया का उपयोग – सुशील पंडित

क्रिया की प्रतिक्रिया होना यह प्ररकृति का मूल सिद्धांत है परंतु वह प्रतिक्रिया मानव जीवन व सृष्टि के अनुकूल हो तब क्रिया का महत्व बढ़ जाता है इसी सिद्धान्त से सरोकार रखता यह लेेेख भी सोशल मीडिया के वर्तमान समय में अच्छे और बुरे पहलुओं पर प्रकाश डाल रहा है।सोशल मीडिया स्वंम में एक संसार की भांति ही है या यूं कहें कि “वर्चुअल वर्ल्ड” की संरचना सोशल मीडिया से ही संभव हो पाई है। सोशल मीडिया वर्तमान में संचार का सबसे तेज माध्यम बन गया है सोशल मीडिया अर्थात सभी प्रकार की सूचनाओं को जन जन तक पहुचाने का निजी स्तरीय माध्यम ही सोशल मीडिया की सार्थकता को सिद्ध करता है।
रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व के लगभग साढ़े तीन सौ करोड़ लोग सोशल मीडिया के किसी न किसी प्लेटफार्म से जुड़े हैं अरतार्थ विश्व की कुल आबादी का  बहुत बड़ी संख्या सोशल मीडिया पर सक्रिय है। समाज में प्रतिदिन घटित घटनाओं का आदान प्रदान सोशल मीडिया में व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि साधनों के माध्यम से किया जा रहा है। आज हम अपनी बात कुछ ही पल में दुनिया भर के सामने रखने में सक्षम हो  हैं। सोशल मीडिया एक अपरम्परागत मीडिया के रूप में हम सब के बीच अपना कार्य कर रहा है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए यह एक सरल साधन
बन चुका है। आज 93 प्रतिशत लोग सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं आकड़ो की यदि बात करें तो एक व्यक्ति औसतन 24 घण्टे में लगभग 3 घण्टे अपने मोबाइल के माध्यम से सोशल मीडिया से जुड़ा रहता है। इस अपरम्परागत मीडिया ने समाज में अपनी अहम भूमिका भी निभाई है इसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति, संस्था, समूह तथा देश की सामाजिक, सांस्कृतिक को समृद्ध भी बनाया जा सकता है। परन्तु क्या हमने कभी विचार किया है कि वर्तमान में सोशल मीडिया के दुरुपयोग से कितनी बड़ी चुनौती हमारे समक्ष खड़ी है आज देश में इसके गलत उपयोग व निजी स्वार्थ के चलते हम एक अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ रहे हैं। एक ऐसा युद्ध जिसमें प्रहार भी स्वंम के द्वारा किया जा रहा है और घायल भी खुद को किया जा रहा है।
हर बात के दो पहलू है ये हम सभी जानते हैं बस हमारी दृष्टि और विवेक किस पहलू को महत्व दे रही है यह विचार करने का विषय होता है। सोशल मीडिया का सदुपयोग करते हुए भारत में अभी कुछ वर्ष पूर्व भ्र्ष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे के नेतृत्व में एक महाअभियान का प्राम्भ किया गया था जिसके परिणाम स्वरूप भ्र्ष्टाचार को लेकर भारत के नागरिकों में जागरूकता का आदान प्रदान हुआ यह आंदोलन एक सफल प्रयास रहा इस दौरान मीडिया के साथ साथ सोशल मीडिया का भी योगदान सरहानीय रहा।
देश में हुए 2014 के चुनाव में भी सोशल मीडिया ने एक प्रभावशाली मंच की भूमिका निभाई जिसके परिणामस्वरूप देश का युवा एकमत हो कर मौजूदा सरकार के लिए सेतू के रूप में सामने आया अब इस उदाहरण में किसी राजनीतिक दल का वैचारिक मतभेद हो सकता है परन्तु तत्कालीन समय में सोशल मीडिया ने सकारात्मक ऊर्जा संचार किया था। वहीं दूसरे पहलू पर यदि नजर डाले तो वर्तमान में इसका दुरुपयोग करके कुछ दल सगठन या फिर व्यकिगत रूप से लोग भी सस्ती लोकप्रियता हासिल करने में लगे हुए हैं। भारत में जहाँ पड़ोसी देशों की सीमाओं पर तनाव है वहीं आंतरिक रूप से देश में सोशल मीडिया पर भी कुछ ऐसी स्थिति देखी जा रही है। परम्परागत मीडिया जैसे समाचार पत्र, न्यूज़ चैनलों से भी तेज रफ्तार में चल रही है यह अपरम्परागत मीडिया। किसी भी मैसेज,चित्र या वीडियो को वायरल करने की तो जैसे प्रतिस्पर्धा हो गई है बिना कुछ सोच विचार किए हम कुछ भी कही भी भेजने में संकोच नहीं करते फिर चाहे वह सूचना किसी धर्म जाति,संगठन या राष्ट्र के अहित में ही क्यों न हो सोशल मीडिया की आड़ में कुछ लोग अपनी आधारहीन राजनीति चमकाने में निरंतर प्रयास करते रहते है।आज जब देश कोरोना जैसी महामारी और पड़ोसी देशों की कुदृष्टि से बचने की लड़ाई में दिन रात लगा हुआ है वहीं सोशल मीडिया पर एक दूसरे दलों व समुदायों, धर्मों पर कटाक्ष करने का खेल
भी जारी है।समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों से पहले ही खबर प्रकाशित भी हो जाती है और प्रसारित भी हो जाती है रही तथ्यों की बात तथ्यों का महत्व वर्तमान सोशल मीडिया में ना के बराबर ही रह गया है और कभी कभी इस लापरवाही का भुगतान भी करना पड़ता है क्योंकि कई बार बात इतनी बढ़ जाती है कि सरकार सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल करने वालों पर कड़ा रुख अपनाते हुए कानूनी कार्यवाही भी करती है लेकिन इसके बाद भी यह सोशल मीडिया का यह अप्रत्यक्ष युद्ध रुकने का नाम नही ले रहा। इस माध्यम से समाज के कुछ असमाजिक तत्व अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग करने में लगे हुए हैं समाज में दुर्भावनाओं का प्रचार प्रसार करके सौहार्दपूर्ण वातवरण को दूषित करने की संकीर्ण मानसिकता के कारण यह कारोबार शिखर पर है।
व्यकितविशेष के अलावा राजनीतिक दल भी अब सोशल मीडिया को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं आए दिन इसके माध्यम से एक दूसरे पर कटाक्ष का कीचड़ उछालने में लगे हैं आम आदमी से जुड़ी समस्याओं को मुद्दा बनाकर सस्ती लोकप्रियता की चाह में राह से भटक गए है। पुराने मैसेज व वीडियो को अपलोड करके अन्य किसी दल समुदाय या व्यकितविशेष का भ्रामक व दुष्प्रचार करना अब सोशल मीडिया का अभिन्न हिस्सा बन चुका है जो हम सभी के लिए भविष्य में बहुत ही घातक सिद्ध हो सकता है। राजनीतिक दलों के सक्रिय आई टी सेल्स अपनी उपलब्धियों के बारे में कम जानकारी दे रहे हैं अपितु दूसरे दलों की आलोचना करने में अधिक विश्वास रखते हैं। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आता है इनके पास हजारों वर्ष के आंकड़े भी पहुंच जाते हैं और फिर होता है जनता को गुमराह करने का खेल और दुर्भाग्यवश कुछ लोग भी इस खेल में बिना कोई विचार किए खुद को खिलाड़ी समझ कर कूद जाते है जिसका परिणाम होता है हर बार जनता की हार। बहरहाल जो भी हो हमें अपने विवेक से ही अपने भविष्य का चयन करना होगा सोशल मीडिया के दोनों पहलुओं से अवगत हो कर ही इसका उपयोग स्वंम के और राष्ट्रहित में करना है किसी भी व्यकितविशेष या दल के द्वारा डाली गई पोस्ट या न्यूज़ के तथ्यों की गहनता से जाँच करने के बाद ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होगी।कहते है आवश्यकता अविष्कार की जननी है सोशल मीडिया वर्तमान में हमारी आवश्यकता है और आवश्यकता से अधिक अपेक्षाएं रखना मानवीय मूल्यों के विरुद्ध हो जाता है। क्योंकि हम और हमारा देश वर्तमान परिदृश्य में विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहा है ऐसे में सोशल मीडिया के माध्यम से किया गया तथ्यहीन प्रचार किसी को भी असमंजस की स्थिति में डाल रहा है।
हमें इस नवीनतम माध्यम के दोनों पहलुओं में से सकारात्मक पहलु का चयन करके अपने राष्ट्र को सुदृढ़ता प्रदान करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि यह सवेदनशील समय सोशल मीडिया पर एक दूसरे की आलोचना का नही अपितु विवेचना करने का है।


 सुशील पंडित पत्रकार
यमुनानगर हरियाणा

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