नया राज्य बनने के नौ साल बाद ही हरियाणा को झेलनी पड़ी आपातकाल की पीड़ा

चंडीगढ़

जब पूरे देश के मुकाबले हरियाणा के लोगों को सबसे अधिक नसबंदी का शिकार होना पड़ा। रोहतक और अंबाला जेल लोगों से खचाखच भर चुकी थीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी के निर्देश पर हरियाणा को जितने लोगों की नसबंदी का टारगेट दिया गया था, उससे चार गुणा अधिक नसबंदियां की गई।इसके पीछे सोच हालांकि परिवार नियोजन की व्यवस्था बहाल करने की बताई गई थी, लेकिन नसबंदी के नाम पर लोगों का जमकर उत्पीडऩ हुआ और इसका विरोध करने वालों पर खूब अत्याचार किये गए। नसबंदी से बचने के लिए लोग उस समय छिपते फिरते थे और घरों से बाहर शौच के लिए जाने से भी डरने लगे थे।

हरियाणा की मनोहर लाल सरकार ने पहली बार आगे आते हुए आपातकाल का दंश सामने लाती ‘शुभ्र ज्योत्सना’ नामक पुस्तक तैयार कराई है, जिसमें 27 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के आपातकाल के अंधेरे के खिलाफ संघर्ष गाथा का बखूबी जिक्र है। इस किताब में आपातकाल का शिकार हुए लोगों की आपबीती को बड़ी ही साफगोई वाले अंदाज में सामने लाया गया है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में आपातकाल एक काले अध्याय के रूप में जाना जाता है। उस समय देश में खौफ की काली चादर और आतंक का साम्राज्य था। अपवादों को छोड़कर न्यायपालिका भी सहम गई थी। आतंक के इस साये से हरियाणा भी अछूता नहीं रहा।

बंसीलाल और संजय गांधी की जोड़ी ने हरियाणा में टारगेट से चार गुणा अधिक कराई नसबंदियां

8 जनवरी 1975 को पहली बार देश में आंतरिक आपातकाल लगाने का सुझाव आया था। यह सुझाव पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के करीबी सिद्धार्थ शंकर रे ने दिया था। उस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल थे।

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