प्रतिकूलता मेंं अनुकूलता की आस लगाए देेेश का अन्न दाता :- सुशील पंडित 

धरती पुत्र यानि किसान किसी भी राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी माना जाता है।अन्न दाता की उपाधि से शशोभित देश का किसान यू तो हर बार, और बार बार व्यवस्था के ताने बाने में उलझकर रह जाता है। परन्तु इस बार जहां हर वर्ग को कोरोना के कुचक्र के सम्मुख घुटने टेकने पड़े वहीं धरती पुत्र को भी इन प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। लॉक डाउन के प्रथम चरण से लेकर अनलॉक के फेस वन के सफ़र में किसान अपनी “आर्थिक विकास” रूपी मंजिल से कोसों दूर रह गया। बात यदि परम्परागत फसलों की की जाए तो किसान की आर्थिक दशा सामान्य या इससे भी नीचे रह जाती है और

यह स्तिथि किसी विशेष शासन काल की नही है बल्कि हर सरकार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसान की भावनाओं को ताक पर रखने में कोई कमी नहीं रहती। जब तक देश में घोषित लॉक डाउन जारी रहा सब्जियों की पैदावार करने वाले किसानों को कोरोना की दोहरी मार झेलनी पड़ी। ट्रांसपोटेशन बन्द होने के कारण सभी प्रकार की सब्जियों की बिक्री में भारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा सब्जियों की खेती पर निर्भर किसान लॉक डाउन के चक्रव्यूह में फंसे रहे इस दौरान शासन प्रशासन की व पुलिस की सख्ती के चलते साधन उपलब्ध न होने व सीमावर्ती राज्यों की सीमाएं सील होने के कारण किसान अपनी बर्बादी स्वंम अपनी ही आँखों से देखने के लिए मजबूर हो गया। यदि भारत की जलवायु के आधार की बात है तो सर्दियों के बाद मार्च से लेकर मई माह तक का समय सब्जी की खेती के लिए अनुकूल माना जाता है सभी प्रकार की सब्जियों की पैदावार के लिए यह तीन महीने सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते है परन्तु कोरोना की वजह से इसी दौरान लॉक डाउन के चलते किसान अपनी फ़सल के लागत मूल्यों से भी वंचित रह गए। सब्जियों की खेती में आलू को छोड़कर अन्य सब्जियों का भंडारण करना किसान के लिए असंभव होता है क्योंकि बाकी सभी सब्जियां इन्हीं तीन महीनों के दौरान ही पैदा होती है और ख़पत का समय भी यही होता है परन्तु कोरोना की वजह से जहां निर्यात बन्द रहा वहीं मण्डिया भी ठप्प पड़ी रही हालात

ये है कि टमाटर व सीजन की हरी सब्जियां  मंडियों में न जाने की वजह से बहुतायत मात्रा में खेतों में ही बर्बाद हो गई। हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ज्यादातर सब्जियां दिल्ली आजादपुर मंण्डी में पहुँचती थी परंतु सरकार के द्वारा दिल्ली की सीमा सील की गई थी इसका नुकसान इन दोनों राज्यों को ज्यादा उठाना पड़ा। हालांकि मौजूदा सरकार ने लॉक डाउन के दौरान रबी की फसल की कटाई व बिक्री में ततपरता जरूर दिखाई जिसकी वजह से किसानों ने राहत की सांस ली।

हमारे देश की राजनीति में सत्ता का सफ़र सड़क से संसद तक किसानों के मुद्दों को बैसाखी बना कर तय करती रही है परन्तु किसान हित की बात करें वास्तविकताओं में अभी अधूरे प्रयास नजर आते हैं। सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्षी दल सभी किसान की प्रगति व विकसित करने का दम भरने का अहसास समय समय पर करवाते रहते हैं परन्तु जिस प्रकार कड़ी मेहनत से किसान अपनी फसल तैयार करने के लिए प्रकृति की मार से दो दो हाथ होता है उसी तरह हर बार किसान को अपनी फसल के लागत मूल्य के लिए भी अनेक प्रकार के संघर्षों से गुजारना पड़ता है कृषि प्रधान कहे जाने वाले राष्ट्र में ऐसी परिस्तिथियों का उतपन्न होना बहुत बड़ी विडम्बना नही तो और क्या है।

उदाहरण के तौर पर अभी 6 जून को विभिन्न किसान संगठनों ने एक स्वर में सोशल मीडिया के माध्यम से पूरे देश में एकजुट होकर अपनी व्यथा मौजूदा सरकार के समक्ष रखने का प्रयास किया। वहीं विपक्षी दल भी मासूम किसान को राजनैतिक महत्वाकांक्षा की लड़ाई में मोहरा बनाने से नही चूकते कभी कभी तो लगता है कि अन्न दाता, धरती पुत्र के नाम से सम्बोधित किया जाने वाला किसान आरोप प्रत्यारोप की राजनीति करने का माध्यम मात्र बन कर रह गया है। यदि  सभी राजनैतिक दल सही मायनों में किसान को सम्मान की दृष्टि से देख रहें है तो यह सभी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि कोरोना में लगे लॉक डाउन के कारण किसान वर्ग को हुए आर्थिक नुकसान की ओर भी सकारात्मक दृष्टि से देख कर विचार किया जाए ताकि सम्पूर्ण जगत का अन्न दाता भी अपने निजी जीवन में सम्पन्न होकर अपने परिवार का पालन पोषण सामान्य रूप से कर सके।

हालांकि कोरोना काल में जहाँ सभी वर्गों के हितार्थ अर्थिक पैकेज की बात हो रही है इसी प्रकार हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के पैकेज में किसानों  को दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी सुनिश्चित की है। सरकार द्वारा की गई घोषित राशि में से डेढ़ लाख करोड़ कृषि क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को सुचारू करने में लगाया जाने की बात कही है। यदि यह सब किसानों की सहायतार्थ वास्तविक रूप से अमल में लाई जाएगी तो बहुत सराहनीय प्रयास होगा।  सुशील पंडित, पत्रकार             

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *