साधना कैसे सफल हो? एक विवेचन:- बाबा-भागलपुर

भक्ति, श्रद्धा, विश्वास एवं धैर्य साधना मार्ग के चार स्तम्भ हैं। हमारी साधना का प्रतिफल इन्हीं चार स्तम्भों पर निर्भर करता है। इस सम्बन्ध में राष्ट्रीय सम्मान से अलंकृत व अन्तरराष्ट्रीय पर ख्याति प्राप्त ज्योतिष योग शोध केन्द्र, बिहार के संस्थापक दैवज्ञ पंo आरo केo चौधरी, “बाबा- भागलपुर”, भविष्यवेत्ता एवं हस्तरेखा विशेषज्ञ ने विवेचनोपरान्त बतलाया कि कभी- कभार सुनने में आता है कि कुछ लोग ये कहते हैं कि उन्हें मंत्रो से कोई लाभ नहीं मिला, तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि उनमें स्वयं में ही कुछ न कुछ कमी है। आजकल ऐसा देखने में आता है कि लोग एक-दो अनुष्ठान करने के बाद ही अपना धैर्य खो देते हैं और अपने गुरु, मंत्र एवं इष्ट पर अविश्वास करने लगते हैं। एक साधक/उपासक को इस तरह धैर्य नहीं खोना चाहिए। ऐसा कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है, जिसे कोई कष्ट या दुःख नहीं है। स्वयं भगवान श्रीराम एवं श्रीकृष्ण के जीवन से हमें ये सीख लेनी चाहिये। जिन्होंने अपने जीवन में अनेको कष्टों का सामना किया।जो लोग अविश्वास करके या मनोनुकूव लाभ न मिलने के कारण गुरु-इष्टदेव मंत्र एवं देवता को बदल देते हैं वो नर्कगामी होते हैं तथा अन्य देवी-देवता भी उन्हें शरण नहीं देते। कितना भी कष्ट क्यों न आ जाये, हमें अपने गुरु-इष्टदेव मंत्र एवं देवी-देवता को नहीं त्यागना चाहिये। प्राचीन काल में जितने भी साधक एवं ऋषि-मुनि हुए हैं उन्होंने एक ही देवता की तब तक उपासना की है जब तक वो देवी-देवता स्वयं उनके सामने वरदान देने के लिए नहीं आ गये। रावण ने हजारों वर्ष तपस्या की और भगवान शिव को स्वयं आकर वरदान देने के लिए विवश कर दिया। हमें वैसे साधक/उपासक, ऋषि-मुनियों से सीख लेनी चाहिए। किसी भी मंत्र और देवी-देवताओं में उतनी ही शक्ति होती है जितना हमारा उन पर विश्वास होता है। साधना को आरम्भ करने से पूर्व एक साधक को चाहिए कि वह जगत जननी माँ जगदम्बा की उपासना या अन्य किसी भी देवी-देवता के उपासना निष्काम भाव से करें। उपासना का तात्पर्य सेवा से होता है। उपासना के तीन भेद कहे गये हैं:- कायिक अर्थात् शरीर से, वाचिक – वाणी से और मानसिक- मन से। जब हम कायिक का अनुसरण करते हैं तो उसमें पाद्य, अर्घ्य, स्नान, धूप-दीप, नैवेद्य आदि पंचोपचार पूजन अपने देवी-देवता का किया जाता है। जब हम वाचिक का प्रयोग करते हैं तो अपने देवी- देवताओं से सम्बन्धित स्तोत्र पाठ आदि किया जाता है अर्थात् अपने मुंह से उनकी कीर्ति का बखान करते हैं और जब मानसिक क्रिया का अनुसरण करते हैं तो सम्बन्धित देवी-देवता के ध्यान और जप आदि किया जाता है। जो उपासक/ साधक अपने इष्ट देवी-देवता का निष्काम भाव से अर्चन करता है और लगातार उनके मंत्र का जप करता हुआ उन्हीं का चिन्तन करता रहता है, तो उसके जितने भी सांसारिक कार्य हैं, उन सभी कार्यों का कार्यान्वयन स्वत: सम्बन्धित देवी-देवता की कृपा  से होने लगता हैं तथा अन्ततः मोक्ष की भी प्राप्ति होती हैं। अगर हम उनसे पुत्रवत प्रेम करते हैं तो वे हमें माँ  के रूप में वात्सल्यमयी होकर हमारी प्रत्येक कामना को उसी प्रकार पूर्ण करती हैं, जिस प्रकार एक गाय अपने बछड़े के मोह में कुछ भी करने को तत्पर हो जाती है। अतः सभी उपासक/ साधकों को चाहिए कि साधना चाहें जो भी करें, निष्काम भाव से करें, निष्काम भाव वाले साधक को कभी भी महाभय नहीं सताता है और ऐसे साधक के समस्त सांसारिक और पारलौकिक कार्य स्वयं ही सिद्ध होने लगते हैं उनकी कोई भी किसी भी प्रकार की अभिलाषा अपूर्ण नहीं रह सकती है। अक्सर हमें देखने और सुनने को मिलता है कि कुछ लोग जो एक क्षण में ही अपने दुखों, कष्टों का त्राण करने के लिए साधना सम्पन्न करना चाहते हैं। उनका उद्देश्य देवी-देवता के उपासना नहीं और उनकी प्रसन्नता नहीं बल्कि उनका एक मात्र उद्देश्य अपनी समस्या से विमुक्त होना होता है। वे लोग यह नहीं जानते कि जो कष्ट वे उठा रहे हैं, वे अपने पूर्व जन्मों में किये गये पापों के फलस्वरूप उठा रहे हैं। वे लोग अपनी जन्मकुण्डली में स्थित ग्रहों को दोष देते हैं, जो कि बिल्कुल गलत है। देवाधिदेव महादेव ने सभी ग्रहों को यह अधिकार दिया है कि वे जातक को इस जीवन में ऐसा निखार दें कि उसके साथ पूर्वजन्मों का कोई भी दोष न रह जाए। इसका फल यह होगा कि अगर व्यक्ति के साथ कर्म-बन्धन शेष नहीं है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। लेकिन हम इस दण्ड को दण्ड न मानकर ग्रहों का दोष मानते हैं।व्यवहार में यह भी आया है कि जो जितनी अधिक साधना, पूजा-पाठ या उपासना करता है, वह व्यक्ति ज्यादा परेशान रहता है। उसका कारण यह है कि जब हम कोई भी उपासना या साधना करना आरम्भ करते हैं तो सम्बन्धित देवी-देवता यह चाहते है कि हम मंत्र जप के द्वारा या अन्य किसी भी मार्ग से बिल्कुल ऐसे साफ-सुुथरे हो जाएं कि हमारे साथ कर्म-बन्धन का कोई भी भाग शेष नहीं बचे। ताकि फिर कभी कुछ भुगतना नहीं पड़े।साधना में पहले शरीर को साधा जाता है फिर मन को साधा जाता है तथा सतत् प्रक्रिया से साध्य तक पहुँच जाता है। यह सुनने में जितना सरल लगता है और करने में उतना ही कठिन होता है। धैर्य एवं एकाग्रता ही साधना में सफलता का मूल मंत्र है।

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