सोशल मीडिया के ताकत का इस्तेमाल किया जाना चाहिए ना कि संदेह किया जाना चाहिए

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मीडिया शब्द आते ही साहित्य में संदेह क्यों आने लगता है मुझे पता नहीं. सबसे पहले जहां से यह बात आती है उसके जड़ में मट्‌ठा डालना चाहिए. सोशल मीडिया आज का आविष्कार है, इसलिए इसकी ताकत का इस्तेमाल किया जाना चाहिए ना कि संदेह किया जाना चाहिए. उक्त बातें टाटा स्टील झारखंड लिटरेरी मीट-2018 में ‘क्या सोशल मीडिया हिंदी/उर्दू भाषा के साहित्य की पहुंच लोगों तक बढ़ा रहा है,’ विषय पर चर्चा करते हुए युवा साहित्य अकादमी प्राप्त विजेता नीलोत्पल मृणाल ने कही.

उन्होंने कहा कि अगर हमारे बुजुर्ग लेखक हमें खारिज करते हैं तो हमें पढ़कर खारिज करें. सोशल मीडिया ने नये लेखकों को पाठकों तक सीधे पहुंचाया है. सोशल मीडिया ने पाठकों से हमारा संवाद कायम किया है. लेकिन बुजुर्ग लेखक टैक्नोफ्रेंडली नहीं होने के कारण भी सोशल मीडिया में आने वाले लेखकों की निंदा करते हैं.

चर्चा में भाग लेते हुए हुसैन हैदरी ने कहा कि सोशल मीडिया ने नये लेखकों को नया प्लेटफॉर्म दिया है. इसके जरिये लोगों में आत्मविश्वास जागा है और लोग लिख रहे हैं. सोशल मीडिया में सभी को मौका मिलता है और अगर अच्छा लेखन है तो उसे लोग पसंद करते हैं. हालांकि सोशल मीडिया में लेखन के प्रति जो संदेह व्यक्त किया जाता है, उसका कारण यह है कि यहां प्रकाशन से पह्रले कोई संपादक नहीं होता है.

सत्या व्यास ने कहा कि सोशल मीडिया ने कवि-लेखकों को सीधे पाठकों तक पहुंचाया है. पहले साहित्य से अकादमिक लोग जुड़ते थे लेकिन आज स्थिति बदली है. आज किसी भी फील्ड के लोग साहित्य में आ रहे हैं, जैसे हुसैन हैदरी चार्टर्ड एकाउंटेंट थे, मैं लॉ के फील्ड से हूं. सबसे बड़ी बात यह है कि लोग इसे पसंद भी करते हैं. सोशल मीडिया में सभी लोग लिख रहे हैं लेकिन टिकेगा वही जो बेहतर होगा बाकी सबकुछ बह जायेगा.

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